Tuesday, August 27, 2013

अपराधी तंत्र या संत

         आज कल एक समाचार सर्वाधिक चर्चा में है 'पूज्य संत आशाराम बापू द्वारा एक नाबालिग लड़की से बलात्कार ' आप अपने टी वी के किसी समाचार चैनल पर जाएं पिछले एक सप्ताह से चौबीस घंटे यही एक समाचार दिखाया जा रहा है आखिर दर्शक बढाने की होड़ जो लगी है। आज सभी राष्ट्रिय अंतर्राष्ट्रीय समाचार इस एक समाचार के सामने बौने हो गए है। अपराध सिद्ध होगा या नहीं होगा यह तो समय बताएगा परन्तु भारतीय मीडिया ने उन्हें बलात्कारी घोषित ही कर दिया है। संत आशारामजी के करोड़ों अनुयाई और शिष्य है बगैर आरोप निश्चित या सिद्ध हुए उन पर इस प्रकार का बर्बर आरोप लगा करसबकी नजरों में उनका मान गिराने का क्या औचित्य है , यदि आरोप निश्चित या सिद्ध नहीं हुए तो उनके सम्मान की जो अपूर्णीय छति हो रही है उसकी भरपाई कौन करेगा। क्या इस अपराध के लिए इन चैनलों पर कार्यवाही की जाएगी? क्या यह कोई षड्यंत्र नहीं हो सकता है ? क्या इस घ्रडित कार्य के लिए शासन द्वारा या उसके संकेत पर उन्हें बदनाम करने का कार्य नहीं किया जा रहा है ? यह सर्व विदित है कि आशारामजी अपने प्रवचनों में कई बार भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध आक्रामक हो जाते हैं और भारत में कहने को तो प्रजा तंत्र है परन्तु वास्तव में राजतंत्र ही है। विशेष रूप से उन राजनैतिक दलों की सरकारों के विरुद्ध बोलना जो एक वंश या एक व्यक्ति की धरोहर हैं। केंद्र की कांग्रेस सरकार कहने को तो एक परिवार की पार्टी की सरकार नही है ; परन्तु यह सर्वज्ञ है कि इन्द्राजी के समय से यह एक ही परिवार की पार्टी बनकर रह गई है और उस दल की सरकार के विरुद्ध बोलने का परिणाम क्या हो सकता है ? रामदेवजी से अधिक कौन जान सकता है ? यदि आशारामजी ने इस प्रकार का जघन्य कृत्य किया है तो उन्हें कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए। व्यक्ति कितना भी महान हो कितना भी सचरित्र हो उससे अपराध हो सकता है और यदि अपराध हुआ है तो वह केवल और केवल अपराधी है और उसे कठोर दण्ड मिलना ही चाहिए लेकिन वह सबके लिए सामान होना चाहिए, चाहे फिर वह संत हो, जनप्रतिनिधि हो, सामान्य व्यक्ति हो, प्रभावशाली बाहुबली हो, हिन्दू हो, मुसलमान हो, मंत्री हो या संत्री हो ।  व्यक्ति के आचरण में गिरावट के लिए एक छण चाहिए , अपराध मानसिक और दिमागी कमजोरी से होता है। वह किसी में कभी भी आ सकती है। विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी भी एक छण में पथभ्रष्ट हो गए थे। 
           उपरोक्त विषय में पुलिस  की अति तत्परता और आश्चर्य चिकत कर देने वाली कार्यवाही के कारण षड्यंत्र की बू आती है , जो पुलिस थाने के सीमा विवाद के चलते घायल व्यक्ति को घंटों चिकित्सालय नहीं ले जाती और वह घायल मर जाने को विवश हो जाता है, अक्सर पीड़ित व्यक्ति को भगा देती है और उसकी प्राथिमिकी नहीं लिखती जब तक सुविधा शुल्क नहीं दिया जाता या कोई ऊंची सिफारिश नहीं होती । वहीं इस मामले में लडकी छिंदवाडा के छात्रावाष में रहती है ,बलात्कार जोधपुर आश्रम में होता है, बलात्कार के बाद भी वह लडकी तत्काल किसी को कुछ नहीं बताती, माँता-पिता को भी नहीं, इसकी शिकायत भी जोधपुर में पुलिस से नहीं करती। कई दिन पश्चात दिल्ली में शिकायत लिखवाई जाती है और पुलिश तत्काल तत्परता से जाँच में लग जाती है। भारतीय पुलिस  इतनी तत्पर कब से हो गई, यदि वास्तव में इतनी तत्पर यह पुलिस हो जाए तो भारत से अपराध समाप्त होने में समय नहीं लगेगा। कल दिनांक २६ को सभी चैनलों पर बार बार दिखाया गया कि आशारामजी के ऊपर से बलात्कार की धारा हटा ली गई क्यों? यदि बलात्कार हुआ था तो धारा क्यों हटाई गई और नहीं हुआ था तो धारा क्यों लगाई गई। क्या सब कुछ पुलिस की मर्जी पर है या उच्च स्तरीय षड्यंत्र ?
            ऐसे एक नहीं कई प्रमाण है जब शाषन के अनाचार के विरुद्ध किसी महान से महान व्यक्ति ने कोई आचरण किया है तो उसे गंभीर परिणाम भोगने पड़े है। तमिलनाडु में शंकर नेत्रालय को लेने की इक्छा मुख्यमंत्री जयललिता की अन्तरंग सहेली शशिकला ने व्यक्त की जिसे कांची कामकोठी के शंकराचार्य पूज्य जयेंद्र सरस्वती ने ठुकरा दिया तो उन्हें ११ नवम्बर २००४ को ह्त्या के आरोप में बंदी बना लिया गया। यदि आरोप सही थे तो क्या यह एक संयोग मात्र था या षड्यंत्र ?  
               इसी प्रकार उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के एक मंत्री अमरमणि त्रिपाठी पर एक कवियित्री मधुमिता शुक्ला के साथ यौन सम्बन्ध बनाने और गर्भवती हो जाने पर ९ मई २००३ को उसकी हत्या करने का आरोप लगा तो उनको बचाने के लिए आई.आई.टी. कानपुर  के होनहार छात्र अनुज मिश्रा पर झूठा आरोप मड दिया गया इतना ही नहीं एक पंडित ने उस बच्चे का विवाह मधुमिता से कराने की झूठी गवाही भी दे दी और इसे मीडिया ने खूब चटखारे ले कर दिखाया । दैवयोग से उन तारीखों में वह अनुज अपने साथियों के साथ भ्रमण पर बाहर गया हुआ था और इस कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध सभी आई.आइ.टी. के छात्र एवं अध्यापक मजबूती से खड़े हो गए इसलिए उस निर्दोष का जीवन बर्बाद होने से बच गया तथा अमरमणि को आजन्म कारावाष हुआ, यदि अनुज बाहर नहीं गया होता तो आज अनुज जेल में होता ।
                फूलन देवी का नाम सभी ने सुना है १४ फरवरी १९८१ को उसने उत्तर प्रदेश के बहमई गाँव में अन्धाधुन्त गोली बरसा कर २२ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। उस अपराध में जब वह जेल में थी तभी १९९४ में  मुलायम सिंह की उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सभी वाद वापस ले लिए गए और उसे जेल से रिहा कर दिया गया। फूलन देवी १९९६ का समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ी और सांसद हो गई, तो अपराधों का क्या हुआ? न्याय और कानून कहाँ गया? कोई अपराधी है या नहीं यह सरकार निश्चित करती है न्याय प्रक्रिया नहीं। सरकार की इक्षानुसार साक्ष्य बनाए और मिटाए जाते हैं। 
               केंद्र सरकार के घोटालों, काले धन और दलाली विरुद्ध आवाज उठाने पर अन्ना हजारे पर किस प्रकार जुर्म ढाए गए , रामदेवजी के शांतिपूर्ण आन्दोलन पर लाठी और गोलियां बरसाईं गईं और उन पर तथा उनके साथी बालकृष्ण पर किस प्रकार अनेकानेक आरोप लगा दिए गए। क्या जो सत्ता का साथ दें उन्हें अपराध करने की छूट है ?विरोध करने पर अपराध दिखाई देने लगते हैं। इसी प्रकार अरविन्द केजरीवाल , प्रशांत भूषण, किरण वेदी आदि पर भी अचानक खूब आरोप लगाए गए और इन सभी आरोपों को मीडिया में रात - दिन नमक मिर्च लगा कर खूब दिखाया। 
              परन्तु ३ सितम्बर २००१ में जामां मस्जिद दिल्ली के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी के विरुद्ध लोधी कालोनी दिल्ली में राष्ट्र विरोधी कार्य करने का केस दर्ज हुआ जिसमें न्यायलय से गैर जमानती वारंट तक निकाला गया परन्तु वे न्यायलय के समक्ष उपस्थित नहीं हुए लगभग ११ वर्ष बाद २०१२ में फिर वारंट ही नहीं निकला अपितु उन्हें भगोड़ा भी घोषित कर दिया गया परन्तु वे उपस्थित नहीं हुए। क्या इस समाचार को भी इन बिकाऊ चैनलों ने इस तत्परता से दिखाया ?
                कहीं भारतीय चैनलें हिन्दू विरोधी सरकार के साथ मिल कर सोची समझी निति के तहत हिन्दू संतों उपदेशकों को बदनाम करने के कार्य में तो नहीं लगे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व निर्मल बाबा के विरुद्ध ऐसा ही एक अभियान इन समाचार चैनलों द्वारा छेड़ा गया और वह कार्यक्रम थोड़े समय के लिए बंद भी हो गया परन्तु फिर किस प्रकार प्रारम्भ हो गया ? प्रारम्भ ही नहीं हुआ अपितु उन्ही समाचार चैनलों द्वारा दिखाया जा रहा है जिन्होंने इसे ठगी बताया था। 

Monday, August 19, 2013

डूबता रुपया और गिरती शाख

          पहले भारत सोने की चिड़िया कहलाता था, जिसे लूटने के लिए  निरंतर विदेशी आक्रमण हुए और उन्होंने खूब लूटा भी, अंततोगत्वा लगभग १००० वर्ष की दासता और संघर्ष के पश्चात १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो १ रुपया १ डॉलर के बराबर था ; परन्तु १९४७ के पश्चात् जबसे भारत में देशी सरकार बनी तभी से लूट और भ्रष्टाचार की भी स्वतंत्रता मिल गई और रुपया धीरे धीरे अपनी चमक खोने लगा। डॉलर बढ़ने लगा और रुपया घटने लगा , ज्यों ज्यों काला धन बढ़ने लगा त्यों त्यों रुपए की कीमत घटने लगी।  नेताओं, तस्करों एवं व्यापारियों का गठजोड़ बनने लगा और इस देश का लाखों डॉलर हर वर्ष काले धन के रूप में भारत से बाहर विदेशों में जमा होने लगा परिणाम स्वरूप भारत की संचित पूंजी चोरी चोरी कम होने लगी।  यह कुख्यात गठजोड़ धीरे धीरे कानून से ऊपर उठ गया परिणाम स्वरुप क़ानून का भय समाप्त होने लगा और मंत्री से लेकर संतरी तक सभी सरकारी विभाग घूषखोरी और दलाली में संलिप्त होते चले गए, काला धन बढ़ता चला गया और फिर हर वर्ष करोड़ों डॉलर का धन या सोना चांदी बैंक लाकरों में बंद होने लगा, इस संचित धन की पूर्ती के लिए नए नए कर लगते चले गए ; परन्तु चोरी और काला धन इतना अधिक बढ़ रहा था कि रूपए का अवमूल्यन होता चला गया। अपराधियों और कालाबाजारियों ने देखा कि चुनाव लड़कर नेता बनने पर कानून का कोई भय नहीं रहता तो ये लोग  स्वयं चुनाव लड़कर संसद और विधान सभाओं में पहुँचने लगे। जहाँ पहले नेता अपराधियों को संरक्षण देते थे अब अपराधी ही देश के कर्णधार होने लगे और इस प्रकार  जनतंत्र के मंदिर अपराधियों के सुरक्षित अड्डे बन गए जहाँ से सीधे दलाली,तस्करी , डकैती, फिरौती, हत्या जैसे जघन्य अपराध होने लगे और इन नेताओं की सम्पन्नता बढ़ती गई जिसके कारण लाखों करोड़ डालर हर वर्ष या तो बहार चले गए या बैंक लाकरों में बंद होने लगे। देश में घुन लग चुका था जो शनै: शनै: रुपए को चाटने लगा और इस देश की छवि एक महा भ्रष्ट देश के रूप में विश्व पटल पर उभरने लगी। पूरे संसार में यहाँ के लोगों को हिकारत की नज़र से देखा जाने लगा रूपए के साथ यह राष्ट्र भी अपनी गरिमा खोने लगा। 
             इस दलाली और चोरी का इन नेताओं को ऐसा चस्का लगा कि अधिकाँश मंत्री लाखों करोड़ की दलाली और चोरी के आरोपों में घिर गए और तो और सर्वाधिक सम्मानित और गरिमामय प्रधानमंत्री का पद भी इस कालिख से मुक्त नहीं रह सका।  खेल हों,रेल हो,सैनिक साज सामान हो,कोयला हो, रेत हो, गरीबों का अनाज हो, स्टाम्प पेपर हों, चीनी हो यूरिया हो हर जगह चोरी बढ़ती गई क़ानून और दंड का भय समाप्त हो चुका  है, हया और शर्म तो कब की मर गई न्यायालय के अंकुश को भी उखाड़ फेंका। त्रस्त जनता के शांतीपूर्ण आन्दोलन को लाठी और बन्दूक से दबा दिया(अन्ना हजारे और रामदेवजी के आन्दोलनों का हश्र जग जाहिर है) और बिल्कुल निरंकुश होकर लूट चालू कर दी। यह स्वयं तक सीमित नहीं रहा जनता को भी अपने रंग में रंगने का प्रयास किया गया। 
             जनता की गाढ़ी कमाई को मुफ्त में लुटाया जाने लगा, सांसद निधि के नाम पर खुली लूट मची , मनरेगा और मद्यान्ह  भोजन द्वारा व्यक्ति को अकर्मण्य बनाया जाने लगा और मुफ्तखोरी की आदत डाली जाने लगी , उद्यमशीलता समाप्त होने लगी, सस्ते अनाज द्वारा और कर्जे माफ करके लोगों में  'यावद जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत' अर्थात कर्ज लो और मौज करो का भाव जागृत किया गया जिससे लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति बढी है ; और जो धन मूल सुविधाओं यथा बिजली , पानी, परिवहन आदि पर व्यय होना चाहिए था वह वोट के लिए जनता को घूष देने में व्यय कर दिया , जिससे सत्ता निरंतर बनी रहे और लूट का सिलसिला  निरंतर चलता रहे। यदि मूल सुविधाएँ बढ़ती तो कृषक को खेती का समुचित मूल्य मिलता ,उद्योग धंधे बढ़ते तो रोजगार के अवसर बढ़ते।  हर प्रकार का उत्पाद यहाँ होता तो हर छोटी मोटी उपयोग की वस्तु विदेशी कम्पनियों से नहीं खरीदनी पड़ती और देश का पैसा देश में रहता। क्या हम शरबत,साबुन, पापड़,चटनी  टी वी ,फ्रिज जैसी चीजें भी बनाने में सक्षम नहीं हैं। मूल सुविधाएं होती तो हमारे उत्पाद सस्ते भी होते जिसे हम निर्यात करके विदेशी मुद्रा कमाते ; परन्तु  फिर नेताओं को लूट का अवसर नहीं मिलता। 
                 अब प्रश्न उठता है कि क्या सरकार को जन कल्याणकारी कार्य नहीं करने  चाहियें ? अवश्य करने चाहियें; परन्तु यहाँ भावना ही गलत है, भावना वोटकी  है, प्रचार की  है, सत्ता की  है, अभी उत्तराखंड त्रासदी पर जो सहायता राशि भेजी गई उसका उद्येश्य सहायता नहीं प्रचार था , इसीलिये जब तक झंडी नहीं दिखाई गई सामग्री नहीं भेजी जा सकी, उस पर बैनर लगाना आवश्यक था भले ही उस देरी में सामान खराब हो गया । रूपए का मूल्य आज भी बिलकुल नहीं गिरा है, संभवतः अब तक अरबों करोड़ डॉलर जो विदेशी बैंकों में जमा है क्यों कि हाल के वर्षों में केवल केंद्र सरकार के जो घोटाले सामने आए उनमें से प्रत्येक कई लाख करोड़ का है, और जो नहीं खुले वह अलग फिर राज्य सरकारों के घोटाले, सरकारी कार्यालयों में हर छोटे बड़े कार्य के लिए दी जाने वाली घूष , दलाली, फिरौती, आदि जघन्य कार्यों से अर्जित अकूत धन वह भी पिछले ६६ वर्षों का। यदि  उसे वापस ले आया जाए और उससे भी अधिक मूल्य का सोना चांदी काले धन के रूप में तिजोरियों में पड़ा है ; यदि यह सब चलन में आजाए तो फिर पहले जैसी स्थिती या उससे अच्छी हो सकती है ; क्यों कि सरकार के आंकड़े और प्रयाष बताते हैं कि यदि विदेशी मुद्रा का आगमन होगा तो रुपए की सेहत सुधरेगी, इसके लिए सरकार यहाँ के छोटे से छोटे धंधे में विदेशी निवेश आमंत्रित करने को आतुर है यदि उपरोक्त धन आ जाए तो इस प्रकार के पागलपन के कार्य नहीं करने पड़ेंगे ; परन्तु यह करेगा कौन ? ऐसा लगता है सर्वाधिक काला धन देश में और विदेशों में इन नेताओं का ही है; तभी तो विदेशों में जमा धन हो या देश का काला धन उसे निकालने के नाम पर सब चुप हो जाते हैं, सबको सांप सूंघ जाता है । 

Friday, October 19, 2012

एक था कफन खाशोट

          एक राजा था कफन खसोट, वह मुर्दों का कफन छीन लेता था, प्रजा उसके अत्याचार से दुखी थी . जब वह राजा मरने लगा उसने अपने पुत्र से कहा "बेटा तुम कुछ ऐसा करना कि लोग मेरे अत्याचारों को भूल जाएं ". पुत्र ने राजा बनते ही घोषड़ा करवा दी "अब से कफन के साथ एक कान भी देना पडेगा ", और प्रजा कहने लगी इस राजा से तो पहले वाला ही ठीक था . ठीक यही स्थिति आज के राजनैतिक दलों की है, प्रत्येक पांच वर्षों के शासन में जनता अत्याचार से कराह कर पहले वाले को अच्छा मान बैठती है, और यही क्रम चलता चला आ रहा है .
          पुरानी तमाम कहावतें और दन्त कथाएँ वर्तमान शासन पर खरी उतरती प्रतीत होती हैं, जैसे "अंधेर नगरी चौपट राजा - टके सेर भाजी टके सेर खाजा " आज भी मोटा अनाज (चना, सवां, काकुन ) महँगा -गेंहू सस्ता , तेल महँगा - डालडा सस्ता, पानी महँगा - दूध सस्ता, सब्जी महंगी - फल सस्ते, आदि .
          एक रावण था, जिसकी सोने की लंका थी, उसने गरीबों और साधू -संतों का रक्त तक निकलवा लिया   था। आज भी संसद और विधान सभाएं रावणों से भरी पडी हैं, जो असहाय जनता के रक्त की अंतिम बूँद तक पीने को तत्पर हैं . इन्होंने केवल दो घोटालों में (कामन वेल्थ और 2जी ) लग भग  ढाई लाख करोड़ रु (25000000000000) लूट लिये, जिससे उस समय 12500 टन स्वर्ण खरीदा जा सकता था, जो सोने की लंका से अधिक ही रहा होगा, जो महमूद गजनवी द्वारा लुटे गए सोमनाथ खजाने से लग भग 625  गुना अधिक रहा होगा। यह तो केवल बानगी है, कोयला लूट, जमीन लूट, और ना जाने क्या क्या? इन्होंने किसानों के खेत और विकलांगों का धन भी लूट लिया, उसे भी नहीं छोड़ा और या लुटेरे एक सड़क के आदमी से (जो इनकी नज़रों में नाली का कीड़ा है ) डर गए। रावण को उसके अपराध के लिए हम आज तक मारते चले आ रहे हैं, परन्तु इन पराभक्छी, रक्त पिपासू दुष्टों का कब संघार करेंगे?

Thursday, June 16, 2011

दम तोड़ता जन लोकपाल

भ्रस्टाचार और काले धन के विरुद्ध खड़े हुए जन आन्दोलनों से सरकार जिस कठोरता से निपट रही है उसकी प्रस्तुति १९७५ के लोकनायक के आन्दोलन फिर ३५ वर्ष बाद ४ जून २०११ की रात १ बजे राम लीला मैदान में देखने को मिली। सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत जन लोकपाल विधेयक का यही हस्र होना लग भग तय हो चुका है। वास्तव में सरकार के अतरिक्त कोई भी राज नैतिक दल और कोई जन प्रतिनिधि इस रूप में इसे नहीं चाहते हैं, जिसमें उनके ऊपर कोई शिकंजा कस सके, क्योंकी सभी राजनैतिक दल और उनके नेता आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, सभी प्रान्त सरकारें, केंद्र सरकार और उनके मुखिया भी कही ना कही भ्रष्टाचार से जुड़े है। जहां तक केंद्र सरकार की बात है वह तो भ्रष्टाचार का अवतार है जिसमें एक के बाद एक मंत्री(ऐ राजा, कलमाडी, दया निधि मारन, फिर चिदम्बरम और परतें खुलने दीजिये--) सम्मिलित हैं। आखिर एक लाख छेहत्तर हजार करोड़ (१७६०००००००००००) की लूट है। आखिर सब के हिस्से में कुछ ना कुछ आया होगा।
सिविल सोसाइटी का जन लोकपाल प्रस्ताव कुछ ऐसा ही है, जैसे चोरों से त्रस्त कुछ लोग चोरों से ही कहें कि भाई एक ऐसा सख्त थानेदार बनाओ जो चोरों और उनके मुखिया को पकड़ कर दण्डित भी करे, भला वो ऐसा क्यों करेंगे। अरे कम से कम मुखिया को तो छोड़ दो, यदि वह छूटा रहा तो अपने गैंग के चोरों उचित हिस्सा मिलने पर बचा लेगा( जैसा शीला के एक मंत्री को निर्दोष करार दिया)। भारत में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद से ही घोटालों का दौर प्रारम्भ हो गया, परन्तु ना कोई अपराधी पकड़ा गया और ना ही पैसा वसूला जा सका; जीप घोटाला, स्टीम इंजन घोटाला, नागर वाला कांड से बोफोर्स तक, यूरिया घोटाला, कमान वेल्थ घोटाला,२जी घोटाला आदि, ये सब केंद्र सरकार कें हैं। इसी प्रकार राज्य सरकारों के अपने घोटाले हैं। आम तौर पर जितनी भी चोरी चोर करते हैं, उनके मुखिया को सब पता रहता है और हर चोरी का एक बड़ा हिस्सा मुखिया लेता है और बदले में अपने गेंग के चोरों को बचाता है(जैसे ऐ राजा और कलमाड़ी का बचाव मनमोहन और सिब्बल ने किया)। किसी किसी गेंग का मुखिया चालाक होता है और वह परदे के पीछे रहता है और गेंग का संचालन कोई और करता है इस प्रकार अपराध बोध से बचा रहता है। जब कभी चोर पकडे जाने की स्थिती में होता है तो पीछे भागती भीड़ पर कुछ धन उछाल देता है और भीड़ वह धन बटोरने में लग जाती है(सांसद निधि से मन रेगा तक तमाम अवसर जन प्रितिनिधियों को दिए गए हैं)
लगभग यही हल इस समय केंद्र एवं राज्य सरकारों और नेताओं का है। वास्तव में चोरी उनकी विवशता है, जो व्यक्ति करोड़ों रुपये व्यय करके चुनाव जीतता है उसकी भरपाई बगैर चोरी कैसे करेगा; इसीलिये कुछ नेता और मंत्री सिविल सोसाइटी के लोगों को चुनाव लड़ने की सलाह दे रहे है। यदि ये वास्तव में ईमानदार हैं तो इतना धन होगा नहीं कि चुनाव लड़ सकें और यदि एक दो लोग जीत भी गए तो वे कुछ भी कर नहीं सकेंगे। चोरी तभी रुक सकती है जब एक सक्छाम और ईमानदार थानेदार हो। यदि पूरा थाना ही चोर हो तो क्या हो सकता है। अन्ना ने ठीक ही कहा है 'यह आजादी की दूसरी लड़ाई है' जो पहली लड़ाई से अधिक कठिन है।

Saturday, April 11, 2009

१९८४ के हत्यारे डायर

यद्यपि १९४७ में भारत कहने को स्वतंत्र हो गया परन्तु यहाँ की सत्ता एक बार फिर जिनके पास आई वो अंग्रेजों के कम जालिम या जल्लाद नही निकले, उनके कार्य करने का तरीका और न्याय प्रडाली भी अंग्रजों की तरह ही है जनता के लिए कुछ और तो नेताओं के लिए कुछ और उसका ताजा उदाहरण है १९८४ के सिखों के हत्यारों को राष्ट्र की सबसे विश्व्स्य्नीय गुप्तचर संस्था द्वारा निरपराध घोषित कर देना। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटें और दासता के उस काले दिन का स्मरण करें, जब १३ अप्रैल १९१९ को अमृतसर के जलियाँ वाला बाग़ में चल रही एक शान्ति पूर्ण सभा में एकत्रित लगभग २००० निहत्थे और निरपराध लोगों पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियाँ बरसा कर सैकडों लोगों को मौत के मुह में धकेल दिया था, और अंग्रेज सरकार ने उसे कोई सजा नही दी थी। लोगों के सब्र का बाँध टूटा और ८ अप्रैल १९२९ को सरदार भगत सिंह ने अस्सेम्ब्ली के गलियारे में बम फ़ेंक कर सरकार के बहरे कानो को जगाने का प्रयास किया; परन्तु व्यर्थ रहा अंत में वही हुआ जो नही होना चाहिए था २१ वर्ष पश्चात लोगों ने क़ानून अपने हाथ में लिया और सात समुन्दर पार जा कर एक बहादुर शहीद ऊधम सिंह ने इंग्लैंड की धरती पर कैक्स्तों हाल में १३ मार्च १९४० को हत्यारे जनरल डायर को गोलियों से भून कर राष्ट्रिय अपमान का बदला ले लिया।
१३ अप्रैल १९१९ से लेकर ८ अप्रैल १९२९ तक का इतिहास फिर दोराने का प्रयास किया गया है। ३१ अक्टूबर १९८४ को देश की प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की ह्त्या कर दी गयी, कहते हैं उसमें एक सिक्ख का हाथ था और बस कांग्रेस के निर्देशन में दिल्ली सहित सम्पूर्ण राष्ट्र में सिक्खों का बर्बरता पूर्वक कत्ले आम किया गया, उन्हें जिंदा जलाया गया और यह सब कांग्रेसी नेताओं के समक्च्छ उनके निर्देशन में हुआ और यह नंगा नाच एक दो घंटे नही पूरे तीन दिनों तक चला। भारत का बहादुर परन्तु शान्ति प्रिय सिक्ख समुदाय २५ वर्स तक यहाँ की न्याय प्रडाली पर भरोसा किए रहा; परन्तु हद तब हो गयी जब १९८४ के ह्त्या कांड के दोषियों को सजा देने के स्थान पर उन्हें sansad में pahunchaane का marg prasast कर दिया गया और nirparaadhee भी घोषित कर दिया गया तब prtikriyaa swaroop सरदार भगत सिंह की तरह बहरे कानों को सुनाने के लिए एक patrkaar ने grahmantree पर जूता फ़ेंक कर मारा, उसका उद्येश्य ना तो गृहमंत्री को अपमानित करना था और ना ही उन्हें छाती पहुचाने का था। यदि अभी भी यह साकार नही चेती तो कहीं फिर किसी ऊधम सिंह का उदय ना हो और १३ मार्च १९४० की घटना की पुनरावृत्ति ना हो यह इस सरकार को देखना है सिक्ख समुदाय को नही। जब जनता को न्याय का भरोसा नही रहता है तभी गुजरात और कंधमाल जैसी घटनाएँ होती है। जहाँ प्रधान मंत्री स्वयं इस राष्ट्र के संसाधानूं पर पहला अधिकार एक विशेष समुदाय का बताता है, जहाउसी समुदाय के दवाब में सर्व्च्च न्यायलय के निर्णय को बदल दिया जाता हो, जहाँ एक व्यक्ति के दोष के लिए सरकार द्वारा स्वयं सम्पूर्ण समुदाय कीअ संघार कराने की परिपाटी डाली गयी हो वहां गोधरा कांड की प्रतिक्रया क्या होनी चाहिए थी, स्वामी लाक्सामानानंद की ह्त्या की प्रतिक्रिया पूर्व की प्रतिक्रिया का अनुसरण मात्र है । यदि लोगों में कानून का भय और विश्वाश उत्पन्न करना है तो जनता और shaasak दोनों के लिए समान क़ानून लागू कराने होंगे अन्यथा इन नेताओं को जूतों से भी भयानक कुछ और झेलना पडेगा।

Friday, March 13, 2009

प्रधान मंत्री की बेंच

भारत में अगले चुनाव घोषित हो चुके हैं और तमाम राजनीतिक दलों का दलदल सा दिखाई देने भी लगा है। इतने राजनैतिक दल देख कर किसी को भी भ्रम हो सकता है कि भारत में सुशाशन देने के लिए अलग अलग नीतिया होंगी अलग अलग उद्येश्य होंगे परन्तु यह आश्चर्यजनक किंतु सत्य है कि सभी दलों का उद्येश्य एक ही है। अपने अपने दल के प्रमुख को प्रधान मंत्री बनाना। यदि कोई ऐसी युक्ति निकल आए कि इन सभी को प्रधान मंत्री बनाया जा सके तो चुनाव की आवश्यकता ही नही रहेगी। इन दलों की ना तो कोई अलग आर्थिक नीति है, ना कोई अलग विदेश नीति है। वैसे इस का हल राज्यों में तो ढूंढा गया था ६, ६ महीने के लिए मुख्य मंत्री बना कर परन्तु अभी तक यह दो तक ही सीमित रहा हैअब प्रधान मंत्री के लिए बहुत उमीदवार है ऐसे में प्रधान मंत्री की कुर्सी हटा कर वहां प्रधान मंत्री बेंच या तखत डाल दिया जा सकता है जिसमें थोड़ा थोड़ा दब कर एक बार में ६ से ७ प्रधान मंत्री तक बैठ सकते हैं और तखत में तो १० से १५ तक बैठ सकते हैं। हर दो महीने बाद दूसरे लोगों को अवसर प्रदान कर दिया जाय। इस प्रकार बगैर चुनाव के ही राष्ट्र के उन सभी लोगों को जो सरकारी धन पर विदेश जाना चाहते हों, अपनी और अपने परिवार वालों की गंभीर बीमारियों का मुफ्त में इलाज करवाना चाहते होंएक अवसर मिल सकेगा। चुनाव में जो धन व्यर्थ होता है उसी धन से इन प्रधान मंत्रियों की कड़की दूर हो जायेगी और चुनाव प्रक्रिया में जो तमाम लोगों की जाने जाती हैं वो भी बच जायेंगी। वैसे भी जो प्रतिनिधि चुन कर जाते हैं उन्हें २०% से अधिक मत नही मिले होते हैं, ८०% लोग तो उनके विरुद्ध ही होते हैं। ५०% लोग तो चुनाव प्रक्रिया में भाग ही नही लेते, जो वोट पड़ते भी हैं उनमे काफी तादाद फर्जी वोटों की होती है। ऐसे में सभी को प्रधान मंत्री बनने का अवसर देने में बुराई भी क्या है, कम से कम प्रधान मंत्री बनने की लालसा में कोई चरण सिंह जैसा कार्य तो नही करेगा , यदि बहुत उतावला होगा तो बेंच पर ज़रा सा दब कर बैठ जायेगा और अपनी हसरत पूरी करलेगा।

Friday, January 30, 2009

चन्द्र मोहन से चाँद मोहम्मद

हरियाणा के पूर्व उप मुख्य मंत्री चन्द्र मोहन अपनी पहली पत्नी एवं बच्चों के रहते हुए दूसरा विवाह करने के लिए इस्लाम स्वीकार करके चन्द्र मोहन से चाँद मोहम्मद बन गए क्यों कि हिन्दू कानून इस प्रकार की लम्पटता की अनुमति नहीं देता है जबकि इस्लाम में एक साथ चार-चार विवाह करने की छूट है। इसी छूट का लाभ लेने के लिए चन्द्र मोहन ने इस्लाम स्वीकार किया। यह कार्य उन्होंने पहली बार किया है ऐसा नही है इसके पूर्व भी समय समय पर लोग इस सुविधा का लाभ उठाते रहे है। धर्मेन्द्र - हेमामालिनी की घटना तो सभी को स्मरण होगी। चाँद मोहम्मद का इस्लाम स्वीकारना तो समझ में आता है परन्तु अनुराधा बाली को क्या सूझा था? उन्हें क्या मिला अनुराधा से फिजा बन कर? चाँद मोहम्मद को तो चार बीबी एक साथ रखने का असीमित अधिकार मिल गया और जब किसी से मन भर जाए जो अति निर्विकार भाव से उसे तीन बार तलाक कहना है। ना तो कोई कानूनी अड़चन ना कोई गुजारे भत्ते का झंझट। हरम में स्थान खाली हो गया उसे यदि किसी हसीना पर मन आ जाए तो उससे फिर भर लो। परन्तु अनुराधा को क्या मिला? सुना है वो पढी लिखी हैं कानून की जानकार है; परन्तु उनके सर पर इश्क का भूत कुछ ऐसा सवार हुआ कि किसी की बसी बसाई गृहस्थी उजाड़ने में भी संकोच नही लगा। अब वो फिजा बन गयी हैं अब उनके समस्त अधिकार छीन गए हैं, ना तो वो अपनी इक्षा से तलाक दे सकती हैं और ना गुजारे भत्ते की मांग कर सकती हैं और ना ही एक पतेके होते दूसरा आदमी रख सकती हैं । चाँद मोहम्मद का जब तक मन चाहेगा उनके जिस्म से खेलेगा और जब मन भर जायेगा कोई दूसरी हसीना अपने हरम में ले आएगा, यदि इन्होने विरोध किया तो तीन बार तलाक का आसन मार्ग खुला है। विवाह के मात्र ५० दिन पश्चात ही संभवतः फिजा जी इस सत्यता से परिचित हो गयी हैं और इसी लिए उन्होंने आत्महत्या का मार्ग चुनने का प्रयाष किया परन्तु असफल रही आख़िर उस पत्नी की आहें भी तो पीछा कर रही होंगी जिसकी अच्छी खासी गृहस्थी इन्होने उजाड़ी है।
मुस्लिम उलेमा जहाँ छोटी छोटी बातों पर नित नए नए फतवे जारी किया करते हैं क्या उन्हें यह दिखायी नही देता है कि लोग किस प्रकार अपनी लम्पटता और कुत्सित वासनाओं की पूर्ति के लिए इस्लाम का सहारा लेते हैं, क्या यह सब इस्लाम में जायज है?